रमज़ान-ईद की खुशियां और जेलों में क़ैद मुसलमानो के घर का हाल

रमज़ान-ईद की खुशियां और जेलों में क़ैद मुसलमानो के घर का हाल

रमज़ान-ईद की खुशियां और जेलों में क़ैद मुसलमानो के घर का हाल

-Moinuddin Ibn Nasrullah @PeaceMoin

अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाह के फ़ज़ल से इस साल भी अल्लाह ने हमें रमज़ान की रहमतों से सरफ़राज़ किया।

हर साल रमज़ान में मुझे All India Dawah Centre Association (AIDCA) द्वारा 2016 में मुम्बई में किया हुवा एक कार्यक्रम याद आ जाता है। जिस कार्यक्रम का विषय था #PeaceIndia2016

इस कार्यक्रम में एक सेशन वकीलों का भी था जिसमे वकीलों ने देश भर की जेलों में बंद मासूम मुसलमान कैदियों के हालत पर चर्चा की थी। सेशन बहुत इमोशनल था, काफी लोगों की आंखों में आंसू आ गए थे। क्योंकि उस वक़्त मुसलमान कैदियों पर हो रहे ज़ुल्म और नाइंसाफी को बयान किया जा रहा था, जो कोई भी इंसानियत का दर्द रखने वाले के लिए बर्दाश्त के बाहर था। खुद मैं भी अपनी आंखों के आंसू रोक नही पाया।

उन वकीलों की टीम में से एडवोकेट तैवर की बात मेरे दिल को एक दम सी छू गयी जो आज भी में याद करता हूँ तो काफी देर तक सोचता ही रह जाता हूँ।उनका कहना था के

“आज हम बड़े आराम से इस AC हॉल में बैठ कर उन कैदियों के बारे में चर्चा कर रहे हैं। लेकिन ज़रा सोचिए उनके घरों पर क्या गुज़रती है, जब किसी का नौजवान बेटा बिला वजह आतंक के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया जाता है। सारी सोसाइटी ऐसे लोगों के कट जाती है। खैर एक हद तक उनका केस भी चलता है, लेकिन सब से ज़्यादा तकलीफ वाली घड़ी ईद और रमज़ान महीने में आती है, जब उनके बच्चों को नया कपड़ा दिलाने वाला नही होता, ईद की खुशियों में उनके बच्चे अपने क़ैद में बंध वालिद को याद करते हैं। आप लोग ऐसे मज़बूर लोगों के परिवार को मत भुला करिये, ये सताये हुवे लोग हैं, उनका खयाल रखना हमारी जिम्मेदारी है”

हम पर ये फर्ज है के हम अपनी ज़कात में से उन फैमिली का भी एक हिस्सा निकालें और उनको पहुंचाए जिनके शौहर/भाई/बेटे इस ज़ालिम हुकूमत के ज़ुल्म का शिकार हैं, जिन्हें क़ैद में इस हुकूमत ने सिर्फ इसलिए रखा है क्योंकि वो मुसलमान है। इन पर आतंकवाद का इल्जाम लगा कर सालों से इंडिया की अलग अलग जेलों में कैद कर रखा है।

इनके घरों की ज़िम्मेदारी पूरी मुस्लिम क़ौम की है। इन तक ज़कात ज़रूर पहुंचाए।

जिन इदारों में सालों से करोड़ो रुपये का फण्ड जमा रहता है, और फिर भी हर साल ज़कात कलेक्ट करते हैं, वैसे इदारों में ज़कात देने से परहेज करें। खुद मज़लूम के घरों तक पहुंचें और कैदीयों के बच्चों के सरो पर हाथ फेरे, उनके घरवालों को इस रमदान और ईद के मौके पर अपनी खुशियों में शामिल करें।

-Moinuddin Ibn Nasrullah @PeaceMoin

share