जिग्नेश मेवानी की मुस्लिम संस्थाओं को “धमकी”

जिग्नेश मेवानी की मुस्लिम संस्थाओं को “धमकी”

कम्युनिस्ट लॉबी के करीब के लोगों ने बताया के @jigneshmevani80 ने जमाते इस्लामी, जमीयत उलेमा जैसी 2002 फसाद में रिफाहि काम करने वाली मुस्लिम संस्थाओं को पिछले दिनों अहमदाबाद में २००२ दंगे की बरसी पर हुवे एक प्रोग्राम में धमकी दी है के अगर उनकी शर्त नही मानी गयी तो वो इन के प्रोग्राम में कभी नही जाएंगे।

वो शर्त ये है के गुजरात 2002 के दंगा पीड़ितों को जो घर बना कर दिए गए हैं, वो घर उन लोगों के नाम कर दिए जाएं।

ये बात पिछले दिनों से में कन्फर्म करना चाह रहा हूँ, अभी तक @jigneshmevani80 से दोस्तों ने कन्फर्म नही कर पाए। लेकिन कुछ कम्युनिस्ट इस धमकी को ले कर खूब उछल रहे हैं। अब सवाल ये पैदा होता है के जिग्नेश की हाजरी इतनी तो कितनी मुस्लिम संस्थाओं ने महत्वपूर्ण बनाली के वो अब धमकी की भी शक्ल लेने लगी है?

मैंने इन धार्मिक संस्था के लोगों से बात किया, कुछ लोगों का कहना था के मकान इसलिए उन लोगों के नाम नही किये जा रहे क्योंकि इनमें से अक्सर मकान बेच डालेंगे।

बहरहाल बात कुछ भी थी, जिग्नेश मेवानी को पहले इन मुस्लिम संस्थाओं से रूबरू बात करनी चाहिए थी जो कुछ भी वो कहना चाह रहे थे, लेकिन खुले प्रोग्राम में धमकी देना बहुत कुछ कह जाता है, खासकर उन मुस्लिम संस्थाओं को धमकी देना जिनके एहसान से वड़गाम की सीट पर ये खुद जीत कर आये हैं।

ये तो अब फैसला जमाते इस्लामी, जमीयत उलेमा जैसी संस्थाओं को करना है के अब वो क्या रवय्या इख़्तेयार करते हैं, लेकिन भाजपा के डर से अगर हम किसी को भी नेता चुन लेते हैं तो नतीजे बहुत संगीन होते हैं। ये बात का इतिहास गवाह है। और हम में से हर कोई इसको जानता और समझता है लेकिन चुप है।

इसमें कोई शक नही है के @jigneshmevani80 वामपंथी विचारधारा रखते हैं, और “लालसलाम” वाले साथी अभी भी “अस्सलाम” बर्दाश्त नही करते, मज़हब को एक “अफीन” समझते हैं। उन्हें मज़हबी अक़ीदाह बर्दाश्त नही। जब मज़हब से नफरत हो तो मुस्लिम मज़हबी रहनुमा रिफाहि काम करे ये इनसे कैसे बर्दाश्त होगा?

गुजरात फसाद मुसलमानो के लिए एक आफत बनकर आया लेकिन कई लाल और दूसरे कलर की NGOs को कमाने का ज़रिया बना दिया। बात एहतियात से कहनी हो रही है वरना कौन नही जानता के हिसाब में घपला की वजह से कितनो के FCRA रद्द हो गए। इनमें वो खातून भी शामिल हैं, जिन्हें मुसलमानो को इंसाफ दिलाई बताया जाता है. ये वही खातून हैं जिन्होंने जाकिर नायक के मुसीबत के वक़्त में हुकूमत की हाँ में हाँ मिलाते आग में पेट्रोल डालने का काम किया था.

मतलब लाल आइडियोलॉजी वालों की मुसलमान दुश्मनी किसी से छुपी हुई नहीं हे. अब ज़रूरत इस बात की हे के हम खुद बेदार हों और अपनों और गेरों में ठिक से फर्क करना सीखें.

-Moinuddin Ibn Nasrullah @PeaceMoin

नोट: जिग्नेश मेवानी की इस मुद्दे पर प्रतिकिर्या आने के बाद इस पोस्ट को अपडेट कर दिया जायेगा.

share